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“ओम शांति। ओम शांति।“

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“ओम शांति। ओम शांति।“

बहुत दिनो के बाद एक उपयुक्त विषय मिला लिखने के लिए। खैर, दिन प्रतिदिन के वार्तालाप मे घुम फिरकर एक विषय अवश्य आता है भगवान और उससे जुडी हुई कई बातें और किस्से-कहानियाँ।
अलग अलग जाति की विशेष टिप्पणियाँ और मान्यताएँ। विशेष धर्म कि विशेष धारणा और क्रियाकलाप। धर्म में जहां मनुष्य को सीखने के लिए एक उप्युक्त दिशा मिलती है उससे कहीं ज्यादा महत्वपुर्ण मानसिक शांति। दैनिक जीवन में मनुष्य किसी न किसी कार्य में उलझा रहता है। कई बार ऐसे हालात भी आते है जब वो थककर बिस्तर पर सोना चाहता है उसे नींद नहीं आती। क्यों?
दैनिक जीवन में जीने के लिए हमें चाहिए रोटी, कपडा और मकान्। यह जरुरते पूरी होती है पैसे से। अब हम उसके लिए या तो किसी के अधीन होकर कार्य करते है या फिर अपना ही स्वरोजगार करते है। पर दोनो ही रुप में हम इसके लिए दूसरे के अधीन ही है। अगर हम नौकरी करते है तो लोग हमें अपना नौकर समझकर शारीरिक शोषण करते है और मानसिक कष्ट देते है। अगर हम स्वरोजगार करते है तो लोग उधार लेकर और पैसे ना चुकाकर मानसिक कष्ट देते है। फलस्वरुप व्यक्ति का दिन का चैन और रातों की नींद उड जाती है। इस तरह कमाया गया पैसा अगर व्यक्ति अपनी बीमारी पर खर्च करता है तो उस पैसे से तो पैसा ना कमाना अच्छा है।
“स्वास्थ्य ही धन है।“ अगर स्वास्थ्य ही नहीं तो धन का क्या लाभ।
साथ ही रोजगार न होना उससे भी बडा अभिशाप है। बेरोजगार व्यक्ति समाज में कहीं सम्मान नहीं पाता और धीरे धीरे अपने ही परिवार में हीन समझा जाता है।
इस तरह लोग आत्महत्या की ओर कदम बढाते है। और कुछ लोग धर्म की ओर झुकते चले जाते है।
दु:ख में सिमरन सब करे सुख में करे ना कोय।
जो सुख में सिमरन करे तो दु:ख काहे को होय॥

जब किसी कि पहली इच्छा पूरी हो जाती है तो दूसरी जन्म ले लेती है। धन प्राप्ति के उपरान्त हमारी जरूरत क्या है?

शांति।
और अब इस शब्द के साथ एक शब्द “ओम” और जोड दिया जाए तो……………

ओम शांति। ओम शांति।

आनन्द।

परमानन्द।

पर जब धन कमाते कमाते ही शांति नहीं है तो बाद में कहाँ से मिलेगी। भगवान ने तो दे दिया सब कुछ अब आप ही मौका चुकेंगे तो उसका क्या दोष। दो आँखें दी पर आप देख नही पाए, दो पैर दिए आप आगे बढ नहीं पाए, दिमाग दिया पर सोच नहीं पाए, हाथ दिए पर कुछ कर नहीं पाए और मन्दिर में चल दिए झोली फैलाए।

ऐसे मनुष्य को और भी बडा दु:ख झेलना पडता है।

धर्म की राह पर ही शांति है। इसलिए कम से कम दो बार ये शब्द “ओम शांति। ओम शांति।“
जरुर दोहराए और शांति पाए।

एक बात और मैं नास्तिक हूँ। पर जब में यह बात किसी को बताता हूँ तो उसके धार्मिक प्रवचन शुरु हो जाते है। एक दिन सबको मरना है। मौत ही सत्य है।……………………

अगर इतना दु:ख संसार में है तो भगवान क्या गोल गप्पे खा रहा है।

खैर यह मेरी व्यक्तिगत धारणा है। भगवान है या नही पर अगर किसी को कोई अच्छी राह मिलती है इससे बडी और क्या चीज हो सकती है। वैसे नास्तिक आस्तिक से कहीं अधिक भगवान को याद करता है। क्योंकि उसकी हर असफलता पर वो उसे गाली देता है तो सबसे बडा भक्त एक नास्तिक है आस्तिक नहीं।

अगर किसी व्यक्ति विशेष को कष्ट पहुँचा हो तो क्षमा करे।

अंत में कम से कम दो बार ये शब्द “ओम शांति। ओम शांति।“ जरुर दोहराए और शांति पाए।

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

anoop pandey के द्वारा
May 28, 2012

आदरणीय योगेश जी, सादार नमन, जिन्दगी बीत गयी…..कुछ शांति को खोजने में और बाकि उसे पाने में…पर अभी तक तो मिली नहीं…..अब आपका सूत्र भी अपना कर देखते हैं……….

    yogeshdattjoshi के द्वारा
    May 29, 2012

    धर्म के रास्ते मे कुछ मिले न मिले (रुपया, पैसा, मकान, दुकान), पर शांति जरुर मिलती है। तो बोलिए ओह्म शांति! ओह्म शांति! आपको लेख पसद आया धन्यवाद।

yogi sarswat के द्वारा
May 28, 2012

योगेश जी,नमस्कार यदि इस विषय की गहराई में जाया जाय तो उत्तर आपने स्वंय ही दे दिया है कि इच्छायें ही मानवीय दुख का कारण हैं. साधु को इस तरह के दुख नहीं होते क्योंकि वह ईच्छाओं से परे होता है. जब आदमी जीवन की जरूरतों से अधिक की कामना करने लगता है तो दुख को दावत देता है! ये सब मित्रवर अपने अपने विश्वास पर निर्भर करता है कोई क्या सोचता है ! बढ़िया लेखन !

    yogeshdattjoshi के द्वारा
    May 28, 2012

    ओम शान्ति! ओम शान्ति। प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।

Mohinder Kumar के द्वारा
May 28, 2012

योगेश जी, यदि इस विषय की गहराई में जाया जाय तो उत्तर आपने स्वंय ही दे दिया है कि इच्छायें ही मानवीय दुख का कारण हैं. साधु को इस तरह के दुख नहीं होते क्योंकि वह ईच्छाओं से परे होता है. जब आदमी जीवन की जरूरतों से अधिक की कामना करने लगता है तो दुख को दावत देता है. लिखते रहिये.

    yogeshdattjoshi के द्वारा
    May 28, 2012

    अध्यापक को प्रश्न का उत्तर पता होता है। तभी वो विद्यार्थी से प्रश्न करता है। अगर आपने बिना उत्तर के प्रश्न किया और मैनें उत्तर पूछ लिया तो……… आप स्थिती समझ सकते है। प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद। ओम शान्ति। ओम शान्ति।

dineshaastik के द्वारा
May 28, 2012

वैसे नास्तिक आस्तिक से कहीं अधिक भगवान को याद करता है। क्योंकि उसकी हर असफलता पर वो उसे गाली देता है तो सबसे बडा भक्त एक नास्तिक है आस्तिक नहीं। भाई बहुत ही सुन्दर बात कही आपने। हाँ आप नास्तिक नहीं है, आप तो मेरी ही तरह आस्तिक हैं। नास्तिक तो वह हैं जो आपसे विपरीत सोचते हैं। धर्मं और ईश्वर के संबंध में मेरे कुछ आलेख एवं कवितायें पढ़िये फिर आपको विश्वास हो जायगा कि असली आस्तिक आप हैं।

    yogeshdattjoshi के द्वारा
    May 28, 2012

    आपको लेख अच्छा लगा धन्यवाद! समय निकालकर आपके लेख जरुर पढुंगा।

चन्दन राय के द्वारा
May 28, 2012

मित्र , वाह खूब बताये आपने शांति और ओह्म शांति के मायने !, तो लगे हाथ मुह हम भी बुदबुदा ले शांति। ओम शांति।

    yogeshdattjoshi के द्वारा
    May 28, 2012

    ओम शान्ति! ओम शान्ति। प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।


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