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ना माँ को ममता ना पिता को आस

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ना माँ को ममता ना पिता को आस,
फिर क्यों आया दुनियाँ मे
और कहलाया आनाथ।
होश सम्भाला और पेट को पाला,
फिर भी कम पड गया एक निवाला।
राही के सामने फैलाता हाथ,
कुछ ह्र्दय पिघल जाते और देते साथ।
पर कुछ का ह्र्दय कठोर है,
बार-बार कहता है,
देता जोर है।
कुछ हँसते उस पर
कुछ उडाते मजाक।
कुछ आखें दिखाते,
न डरा तो दिखाते हाथ।
आँख से बहती गंगा रानी,
कुछ के लिए मोती तो कुछ के लिए पानी।
कोई बच्चा कहीं चिल्लाया,
मम्मी – मम्मी!
उसने उसका ध्यान बटाया!
दौड के मम्मी आई,
लगी देखने सिर से पैर,
न लगी चोट न खरोच पाई।
लगी पुछने प्यार से
मुनने राजा,
कौन है तुझे सताता।
राजा अहंकार से बोला,
मुझे चाहिए एक खिलौना।
नहीं तो शुरु कर दूँ मै रोना।
मम्मी ने डुगडुगी वाले को बुलाया –
मुन्ने को खिलौना दिलवाया।
मुन्ने को मम्मी ने गोद में उठाया
पोछे आंसू और मुन्ना भी मुस्कराया।
पर उसके लिए ये एक स्वप्न है,
है ये हकीकत पर फिर भी भ्रम है।
पोछ्कर आंसू बैठा है उदास
ना माँ को ममता ना पिता को आस,
फिर क्यों आया दुनियाँ मे
और कहलाया आनाथ।
सीढीयाँ मंदिर की,
मंदिर में बैठे है राधा और मोहन।
मुँह पर रखकर हाथ बैठा है ऐसे,
जैसे हो गया हो सम्मोहन।
घन्टी बजी और लगे लोग दौड पडने।
लगा पैर टूटा उसका सम्मोहन,
सिर पर रखकर हाथ खुजाया,
फिर उस उदास चेहरे को
मैने हँसता हुआ पाया।
लगा देखने इधर-उधर
और दौडा सरपट।
फिर दुबारा हाथ फैलाकर
खडा हो गया झटपट।
ये सब देखकर एक ख्याल है आया,
कितने खुश किश्मत है हम
हमारे साथ है माँ बाप का साया।
बेशक वो धूप में नंगे पांव है चले,
पर हम आज भी है एक छत के नीचे
पहने हुए शूज अपने पैरो के तले।
इतने में वो दौडकर वापिस आया
मुझे देखकर हाथ फैलाया।
मेरे मन में रोना आया,
कठोर होकर ना में सिर हिलाया
पर फिर भी उसे न जाता पाया।
फिर उसने कहा मुझे भूख लगी है।
मैने रेडे वाले से उसके लिए
खाने का सामान मंगवाया।
लेकर उसे वो मस्ती में झूमा,
खाया बाद में पहले चूमा।
इतने में हमारी बस आई,
टिकट कटाकर बस में बैठा भाई।
एक तरफ थी खुशी
तो दूसरी ओर मन था उदास।
ना माँ को ममता ना पिता को आस,
फिर क्यों आया दुनियाँ मे
और कहलाया आनाथ।
त्रुटी के लिए जरूर कराए साक्षात्कार फिलहाल नमस्कार।

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sinsera के द्वारा
April 25, 2012

योगेश जी , नमस्कार, ये समाज की एक कड़वी सच्चाई है. मैं आप को बताऊँ इन बच्चों को इन के निकम्मे माँ बाप ने भीख मांगने की ऐसी लत लगवा दी होती है की आप चाह कर भी इन का कुछ भला नही कर सकते. जी हाँ इन में शायद ही कोई अनाथ हो…सब के निठल्ले मुफ्तखोर माँ बाप आस पास घूमते रहते हैं….यकीन न हो तो इन को स्कूल में नाम लिखाने का ऑफर दे कर देखिये……

    yogeshdattjoshi के द्वारा
    April 26, 2012

    सरिता जी नमस्कार, एक दिन की बात है मैं नाईट लगाकर घर वापिस आ रहा था अचानक निगाह एक बोर्ड पर पड़ी जिस पर लिखा था. “भीख देकर आप इन्हें निक्कमा कर रहे है.” इन शब्दों ने दिल जीत लिया अब तक अमिट है. पर इन्ही के बीच कुछ ऐसे लोग भी है जिन्हें सचमुच मदद की दरकार है. उदहारण के तौर पर आपको भी कभी किसी चीज के लिए किसी के सामने हाथ फैलाना पड़ा होगा. वो इंसान इंकार भी नहीं करता पर दलील देता है “एक बार एक पडोसी को दी थी उसने वापिस नहीं की.” इस तरह एक इंसान की जगह वो पूरा समाज दण्डित होता है जिसे सचमुच मदद की दरकार होती है. गेहू के साथ घुन भी पिस्ता है पर घुन के कारण क्या आप गेहू नहीं पिसेंगी???

    sinsera के द्वारा
    April 26, 2012

    हाँ, घुन को निकाल कर तब गेहूं पीसूंगी ..


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